सोमवार, 6 अप्रैल 2026

मिनिएचर गाय; ये पुंगनूर सच में बड़ी प्यारी है, इतनी छोटी और मोहक कि वन बीएचके फ्लैट में भी पल जाए...

सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर: देखन में छोटे लगै, घाव करें गंभीर... कुछ इसी लाइन पर चलते हैं तो बनता है- देखन में छोटी लगे, भाव बड़े गंभीर... कवि बिहारी लाल चौबे(1995-1663) की रचना 'बिहारी सतसई' के दोहे बहुत अर्थपूर्ण तथा सारगर्भित होते थे, उसमें छिपे संदेश बड़े और बहुत महत्वपूर्ण होते थे, उसी तरह से दुनिया की सबसे छोटी गाय भी गुणों की खान है.


भारत की ये देसी गाय पुंगनूर नस्ल की है और आंध्र प्रदेश इसका पहला घर है. चित्तूर जिले का पुंगनूर इलाका, यहीं से शायद इसे अपना नाम भी मिला-पुंगनूर. देखने में और स्वाभाव से जितनी प्यारी है, पुंगनूर गाय की बातें उतनी ही रोचक हैं. ये गाय सोशल मीडिया पर रील्स में छाई है, संपन्न वर्ग इसे अपने घरों-फ्लैट्स में पाल रहे हैं. एक समय था जब इन बौनी गायों का अस्तित्व खतरे में था, पर आजकल ये खासी सुर्खियां बटोर रही है.

फैक्ट्स बताते हैं कि 1997 में पुंगनूर नस्ल की महज 21 गायें बची थीं. फिर शुरू हुई इन्हें बचाने और बढ़ाने की मुहिम. राज्य और केंद्र सरकारों के प्रयास की बदौलत साल 2019 आते-आते इनकी संख्या 13000 पार कर गई. इंटरनेट की दुनिया में पुंगनूर का वायरल होना भी इसकी प्रजाति को बचाने में काफी मददगार माना जाता है. याद ही होगा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो आया था, दिल्ली में सरकारी आवास पर इन्हीं गायों को चारा खिला रहे थे.

70 से 90 सेंटीमीटर की हाइट यानी 4 इंच से भी कम ऊंची. चौड़ा माथा, छोटी सींग पर पूंछ बड़ी. वजन एक से दो क्विंटल का और एक दिन में 2 से 5 लीटर तक दूध देती है. सफेद, भूरे और काले रंग की ये गायें 15 से 20 साल तक जीती हैं. दिनभर में 5 किलो के करीब दाना-चारा काफी है. इस लिहाज से इसे पालने में खर्च कम लगता है और साफ-सफाई का भी कोई बड़ा सिरदर्द नहीं. इससे कहीं ज्यादा खर्च तो आजकल एक कुत्ता पालने में हो जाता है.


पुंगनूर का दूध A2 कैटेगरी का माना जाता है, मतलब सेफ और औषधीय गुणों वाला। नाॅर्मली, गाय के दूध में 3 से 5 फीसद वसा पाया जाता है, लेकिन पुंगनूर के मिल्क में 8 प्रतिशत तक फैट होता है. भारत में देसी गायों की वैसे 50 के करीब नस्ल पाई जाती है. इनमें से गिर और साहीवाल को सबसे अधिक दूध देने वाली गायें माना जाता है. करीब-करीब हर राज्य में एक-दो देसी गायों की खास नस्ल उसकी पहचान है.  

20वीं पशुगणना(2019) के आंकड़ों के मुताबिक देश में लगभग 14 करोड़ देसी गायें हैं. इनका भारत के डेयरी उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा योगदान है. हालांकि इन सबके बीच एक दूसरा पहलू भी है. एक तरफ गायें पूजी जाती हैं, दूसरी तरफ हर साल सड़क पर प्लास्टिक कचरा खाकर हजारों दम तोड़ रही हैं. भारत में गोकशी प्रतिबंधित है पर गोतस्करी-गोहत्या भी हो ही रही है. एक शंकराचार्य ने तो बकायदा इसके खिलाफ मोर्चा ही खोल दिया है. बहरहाल, मसला जो भी हो, भारत जैसे देश में ये सब बंद होना ही चाहिए.