सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

श्रीशैलम्, मल्लिकार्जुन स्वामी और आदि शंकराचार्य-शिवाजी की यात्राएं...

नल्लामला की मनमोहक पहाड़ियां, हरे-भरे जंगल और कल-कल बहती कृष्णा। ऐसे बेजोड़ प्राकृतिक सुंदरता के बीच बसा है श्रीशैलम्। आंध्रप्रदेश के कर्नूल जिले का एक बेहद शांत और धार्मिक शहर. खुद की आबादी यहीं कहीं 25 हजार के आसपास है, बाकी इससे तो ज्यादा श्रद्धालु हर दिन यहां आते-जाते हैं. 12 ज्योतिर्लिंग में से दूसरे और शिव के स्वरूप मल्लिकार्जुन स्वामी यहीं विराजमान हैं.

श्रीशैलम् में आदि शिव के साथ देवी भ्रमरम्बा का भी अद्भुत वास हैं. भ्रमरम्बा को मां पार्वती का ही अंश माना जाता है और इनका मंदिर भारत के 18 महाशक्ति पीठों में से छठा है. देश में ऐसे ज्योतिर्लिंग बहुत अनूठे हैं, जहां भगवान शंकर और माता पार्वती दोनों के दर्शन होते हों. धार्मिक-ऐतिहासिक खासियतों और कुदरती खूबसूरती से लकदक ये नगर तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र वालों के लिए उनका बहुत प्रिय डेस्टिनेशन है. वीकेंड हो या कोई और छुट्टी, लोग पहुंच जाते हैं परिवार, नाते-रिश्तेदारों के साथ.

शानदार सड़कें, रेल-एयर की अच्छी कनेक्टिविटी और हरियाली से घिरे रास्ते यहां आने-जाने वालों का दिल खोलकर स्वागत करते हैं. वैसे तो लोगों का सालभर तांता लगा रहता है, लेकिन अक्टूबर से फरवरी तक अच्छा समय रहता है श्रीशैलम् घूमने का. धार्मिक पर्व या त्योहार और वीकेंड (शनिवार, रविवार, सोमवार) पर लोगों की खासी भीड़ रहती है.यहां की पवित्रता और प्रतिष्ठा यूं समझ सकते हैं कि श्रीशैल महाक्षेत्रम् को धरती पर दूसरा कैलाश माना जाता है. 

 आप बहुत सुकून पसंद हैं तो ऐसे दिनों को छोड़कर यात्रा प्लान कीजिए। जून से सितंबर तक का समय तो नेचर के साथ घुल-मिल जाने वालों के लिए अद्भुत ही है. हरियाली से लदे पहाड़, जंगल, नदी और डैम मानो बांध ही लेते हैं. प्रकृति से साथ जुड़ने का, कुछ पल उसके साथ जीने की अनुभूति चाहिए तो सड़क से और अपने साधन के आइए. बस इतना ध्यान रखिए कि ये रास्ता अमराबाद टाइगर रिजर्व के बीचो-बीच होगर गुजरता है, इसलिए गेट रात 9 बजे से लेकर सुबह 6 बजे तक बंद रहते हैं. इको सेंसटिव जोन होने के चलते इस दौरान व्हीकल्स की एंट्री पर रोक है.

कहते हैं प्रभु श्रीराम और पांडवों ने भी मंदिर परिसर में शिव लिंगम् की स्थापना की थी. 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य ने भी यहां रहकर तपस्या की, किताबें लिखीं। भारत को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने और अपनी प्राचीन सभ्यता-संस्कृति की रक्षा का प्रण उठाने वाले महान सम्राट शिवाजी भी मल्लिकार्जन स्वामी का आशीर्वाद लेने आए थे. भूमिका थोड़ी लंबी हो गई पर इस लेख का कोर यही हैं- शिवाजी महाराज.

शिवाजी महाराज, मार्च-अप्रैल के दरम्यान साल 1677 में यहां आए और तकरीबन 10 दिन तक तपस्या-साधना की. महान क्रांतिकारी, स्वाराज के संस्थापक, मुगलों-अंग्रेजों से लोहा लेने वाले, गुरिल्ला युद्ध के जनक, 17वीं शताब्दी में एक भारत, श्रेष्ठ भारत का सपना देखने वाले शिवाजी(1630-1680) की उसी श्रीशैलम् की यात्रा और उनके संपूर्ण जीवन वृतांत को यहां एक संग्रहालय की शक्ल में ढाला गया है. शिवाजी स्फूर्ति केंद्रम् की दीवारों पर शिवाजी का जीवन बहुत ही खूबसूरती से उकेरा गया है. विवरण हिंदी में लिखा गया है, लेकिन एक चीज जो खटकती है, वो है बड़े पैमाने पर भाषा की अशुद्धियां. 

जब इतना अच्छा प्रयास किया गया तो किसी हिंदी पर पकड़ रखने वाले को पकड़ लेते, उससे लिखवा लेते. यहां घूमने आने वाले खासकर हम जैसे हिंदी भाषा-भाषी लोगों के लिए यह एक बुरा अनुभव है. अपने ही देश में ऐसे ही कई ऐतिहासिक जगहों, धरोहरों, मंदिरों, संग्रहालयों में भाषा की बुरी गत देखने को मिलती है. राष्ट्रपति मुर्म, संघ प्रमुख मोहन भागवत, पीएम मोदी जैसी बड़ी-बड़ी शख्सियतें इस म्यूजियम को दौरा कर चुकी हैं, पता किसी नजर क्यों नहीं पड़ी? शिवाजी का 19 फरवरी को जन्म दिवस है और वह चुनाव की दहलीज पर खड़े उत्तर प्रदेश की राजनीति के केंद्र में रहने वाले हैं. देश सबसे बड़े राज्य(आबादी)  में 2027 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं.

महाराष्ट्र से दिल्ली का रास्ता कहीं न कहीं यूपी से तो होकर ही गुजरता है. केंद्र से लेकर इन प्रदेशों में भी एक ही पार्टी की सरकारें हैं. सियासी भावनाओं की एक जैसी बयार बह रही है. हवा के इसी रुख को समझा है महाराष्ट्र और यूपी के सरदारों ने. योगी सरकार ताजमहल के पास निर्माणाधीन संग्रहालय का नाम बदलकर छत्रपति शिवाजी महाराज म्यूजियम रखने जा रही है, जबकि फणनवीस सरकार भी आगरा में उसी जगह संग्रहालय बनवाने की तैयारी कर रही है, जहां शिवाजी को औरंगजेब ने 1666 में कैद कराया था. मेरी दोनों सरकारों से गुजारिश कि कृपया, इन जगहों पर भाषा और लिखावट का ध्यान रखिएगा. 

(तस्वीरें ज्यादा मेरी खुद की खींची हुई हैं, एक-दो srisailadevasthanam.org और srisailamshivaji.org से ली गई हैं.)      



शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

वो आम है तभी तो खास है....


तो भइया! दक्षिण में आम पक चुके हैं, तुम उत्तर वाले करो मई-जून का इंतजार। लाल टोकरी वाला है हिमायत आम और नीली टोकरी में है बंगनपल्ली। दोनों ही किस्में साउथ में आमों के राजा हैं. तेलगु में पल्ली छोटे गांवों को संबोधित करने के लिए लगाया जाता है. 

इस हिसाब से बंगनपल्ली वो छोटा सा गांव या इलाका हुआ, जहां से ये आम की प्रजाति निकली। यह जगह आंध्र प्रदेश के नंदयाल जिले में पड़ती है. क्या गजब का स्वाद है भाई. एकदम कसूता। हमने तो मकर संक्राति पर चख भी लिया!   

हिमायत का भी किस्सा दिलचस्प है. बताते हैं कि मूलरूप से यह तमिलनाडु की पैदावार है. एक बार कहीं से मुगल बादशाह हुमायूं के दरबार में पहुंचा तो बादशाह और उनकी बेगमों को इसकी दिलकश सुगंध और स्वाद ऐसा चढ़ा कि एक नाम हुमायूं पसंद भी रख दिया गया.

हैदराबाद के निजामों-नवाबों को भी खूब भाया यह हिमायत। आंध्र प्रदेश में महबूबनगर के आसपास के जिलों में इसकी बागवानी होने लगी. अब यह जिला तेलंगाना में है पर 2014 से पहले तक सब आंध्र ही था. 

अब बात आम हो चली तो यह भी जान लीजिए कि दुनिया के 100 से अधिक देशों में आम की बागवानी होती है. चीन, थाईलैंड, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, मैक्सिको जैसे देश आम उत्पादन में खास स्थान रखते हैं. 

भारत तो खैर आम महाशक्ति है. दुनिया के कुल मैंगो प्रोडक्शन का 50 फीसदी तो यहीं होता है. अपने देश में लोकल से लेकर एक्सपोर्ट क्वालिटी की तकरीबन 1500 से अधिक किस्में हैं. 


2023-24 में भारत ने 32. 000 मीट्रिक टन आम निर्यात किया। इसकी कुल रकम बनी लगभग 60.14 मिलियन डाॅलर यानी कि 54.34 अरब रुपए। शायद इसी को कहते हैं आम के आम गुठलियों के दाम. देश के अलग-अलग राज्यों की आम की अपनी एक खास किस्म है. 

मसलन यूपी का दशहरी, लंगड़ा, चौसा(बिहार-हरियाणा), अल्फांसो(महाराष्ट्र), केसर(गुजरात), हिमसागर और मालदा(पश्चिम बंगाल), तोतोपुरी(तमिलनाडु-कर्नाटक), नीलम(आंध्र) प्रमुख रूप से हैं.


आम्रपाली और मल्लिका जैसी हाईब्रिड किस्में भी काफी स्वादिष्ट होती हैं. ये दोनों उत्तर की दशहरी और दक्षिण की नीलम के मिश्रण हैं. बताते चलें कि कर्नाटक के श्रीनिवासपुर को भारत का मैंगो सिटी कहा जाता है. कोलार जिले के इस इलाके में करीब-करीब 63 किस्में के आम होते हैं.  



बुधवार, 15 अक्टूबर 2025

देहात का महासागर और अलसाई सांझ...



उत्तर प्रदेश के किसी हिस्से में देहात का महासागर और उमस भरे बरसाती मौसम में अलसाई सांझ। कुदरत के कैनवास पर बहुतेर रंग भरता सूरज बादलों में छिपता-छुपाता कल तैयारी कर रहा है. रास्ते वही, खेत-खलिहान वही, लेकिन रात में पूरी दुनिया घूमकर सूरज जब गांव में फिर लौटेगा तब शायद सुबह नई होगी। 



आजकल इंसानों और भेड़-बकरियों में कितना ही फर्क बचा है, शाम की सैर करके दोनों ही बोझिल कदमों से घरों को लौट रहे हैं. कहना मुश्किल है कौन किसको चरा रहा था. 



गांव-गांव को शहर पहुंचाती मैं एक पगडंडी. वर्तमान को गिरवी रखकर जाने कितने युवा बेहतर भविष्य के लिए शहर चले गए, मैं वहीं की वहीं ठहरी रही. घर-परिवार की रौनक जवान लड़के-लड़कियों के गांव के जाने के बाद बहुत कुछ ठहर गया. वो थे तब हर शाम जैसे दिवाली थी, हर दिन मेला जैसा. अब ज्यादातर घरों में अंतहीन इंतजार करतीं बूढ़ी आंखें बसती हैं. उन आंखों में जब तब सुकून के आंसू बहते रहते हैं कि बच्चा जहां भी होगा, सुखी होगा पर शहर जाने वाले कभी लौट नहीं पाए...



गांव की पुलिया, करीब-करीब हर गांव में राजनीति-चकल्लस का अभिन्न अड्डा। विचारधारा की गुटबंदी के हिसाब से दोनों तरफ लोग बैठते थे और बड़े-बड़े राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को चुटकी में निपटा देते। इनकी चर्चा-परिचर्चा सुनकर यकीन ही नहीं पूर्ण विश्वास हो जाता है कि यूएन, डब्ल्यूएचओ जैसी वैश्विक संस्थानों की परिकल्पना एक तरह से फिजूल और मूर्खताभरी सोच ही रही होगी. जाने कितनी सरकारें यहां रोज बनती और गिरती हैं. ट्रंफवा, मोदिया,  जोगिया... जाने कितनों की इनके दरबार में रोज पेशी होती है. हालांकि बदलते समय के साथ इसका स्वरूप भी बदल गया, अब चकल्लसबाजों का अड्डा है चाय की टपरी.

पुलिया पर बैठे एक किसान की भी दुकान सजी है, लेकिन खरीदार कोई नहीं है. गांव की यही शुद्ध और ताजी चीजें शहर पहुंचते-पहुंचते प्रदूषित हो जाती हैं और मनमाने दामों में बिकती हैं. शहर को गांव बहुत कुछ देता है, बदले में पाता शायद कुछ भी तो नहीं!





इस छोटी सी बतकही में एक छोटा सा किरदार मैं. गांव-गिरांव, नदी-पोखरे, पेड़-पल्लव-जंगल, खेत-खलिहान बहुत याद आते हैं. बाकी युवाओं की तरह मैं भी शहर गया था कमाने। सालों बाद पाता हूं कि जिंदगी की बैलेंसशीट में बहुत कुछ माइनस है.



रविवार, 12 अक्टूबर 2025

चार यार... और चार जीवन यात्राएं


संदीप, मनीष, मुकेश और दूसरे फ्रेम में उदय। चार जीवन यात्राएं सुनाती दो तस्वीरें। मनीष और संदीप अच्छे पत्रकारों में शुमार हैं, उससे भी अहम कि मेरे बेहद अजीज, करीबी और भरोसे के मित्र हैं. रिश्तों पर बरसों के धूल तो जमी थी, लेकिन जब 10-12 साल बाद मिले तब दोस्ती में वही ताजगी, अपनापन और मिठास मिली।

मनीष और मैं अमर उजाला, मेरठ के साथी हैं, 2004 से 2007 तक मैं वहीं था. फिर मैं दैनिक भास्कर चला गया और मनीष, दैनिक जागरण नोएडा। मनीष, एक बहुत गंभीर और गहरी सोच वाले पत्रकार हैं.

ऐसे ही संदीप, छोटे भाई जैसे हैं. एक शांत, आत्मीय और बुद्धिजीवी पत्रकार। संदीप 2012 में मिले जब मैं लुधियाना से ट्रांसफर होकर पानीपत भास्कर आया और वह अंबाला भास्कर में थे. कुछ वक्त गुजरा, संदीप हिंदुस्तान के हो गए. दोनों दिग्गज तब से इन्हीं मीडिया संस्थानों में बड़ी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. इतने सालों में हमारी सूरत, सीरत तकरीबन वैसे ही हैं, बस मैं और मनीष सफेद हो गए, लेकिन संदीप अभी भी कलरफुल बने हुए हैं!

फ्रेम में लास्ट में उदय हैं. लुधियाना भास्कर लाॅन्चिंग 2007 के मेरे साथी। रहवासी उत्तर के हैं पर विचार और राह दक्षिण की पकड़ ली. पढ़ने-लिखने और अपनी ही धुन में रहने वालों में से हैं. पंजाब में हम लोगों का चार मित्रों का जबरदस्त ग्रुप था. चार अलग-अलग उम्र, सोच-विचार और पृष्ठभूमि से, लेकिन हमारे बीच पटी बहुत अच्छी. अब भी वही बात है, बस वक्त का तकाजा है कि एक बार बिछड़े तो फिर साथ काम करने का मौका नहीं मिला. उदय भी दैनिक जागरण में सेवाएं दे रहे हैं. बड़ी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं.


छोटी सी भेंट-मुलाकात समय के तहखाने में बंद जाने ही कितनी बातों को रिफ्रेश कर गई. मनीष, संदीप आप दोनों का बहुत बहुत आभार, अभिनंदन. आखिर में बस इतना ही दोस्तों, संबंधों में धूल झाड़ते रहिए...

शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

चूहों ने बुलाई आपात बैठक, लोगों की परेशानी पर शहर से माफी मांगी

अब तक के सृष्टिकाल में यह दूसरी ऐसी मीटिंग, इससे पहले बिल्ली के आतंक से छुटकारा पाने के लिए जुटे थे. तब सवाल उनके अस्तित्व का था, अब उनकी इमेज का. शहर के सारे चूहे एक जगह इकट्ठा होते हैं और शुरू होता उनके राजा का संबोधन।

चूहों का राजा: आप सब को अचानक यहां इस बुलाना पड़ा। हमारी छवि और साख को बट्टा लगाने की साजिश हुई है. हम पर गिल फ्लाईओवर गिराने का बड़ा आरोप लगाया गया है. कहा गया कि पूरा लुधियाना शहर हमारी वजह से तकरीबन एक महीने से जाम झेल रहा है. हमारी जाति-बिरादरी के लिए यह चिंताजनक है. जो अपराध हमने किया ही नहीं, उसके लिए हमें बदनाम किया जा रहा है.

तभी एक नवयुवक चूहा तैश में खड़ा हुआ. 'क्षमा करें महाराज! शहर के लोग जाम से परेशान हैं, इससे हमारा क्या लेना-देना? हमने क्या किया?'

'तुम नौजवानों की यही समस्या है. बस अपनी ही दुनिया में खोए रहते हो. अरे भाई! देखा नहीं। कितनी आसानी से हमारे ऊपर इल्जाम लगा दिया गया कि चूहों ने नीचे की मिट्टी खोद डाली, इसलिए पुल की रिटेनिंग वाॅल ढह गई.', सभा में आए उम्रदराज चूहे ने मसले को स्पष्ट करने की कोशिश की.

'हम तो इस धरती पर कब से रह रहे हैं, जमीन खोदना हमारा स्वाभाव है. ऐसा आरोप हमारे समुदाय पर पहले कभी तो नहीं लगा? कि कोई पुल हमारी वजह से गिर गया हो. हां, रेलवे पटरी खोदने तक की बात तो खैर और है.', उसी नौजवान ने अपनी बात थोड़ी मजबूती से रखी.

'तुम नहीं समझोगे। अभी दुनिया ही कितनी देखी है तुमने? आखिर देश चला रहे नेताओं, अफसरों की भी तो कोई फितरत होती है. हर घटना-दुर्घटना के लिए आरोप दूसरों पर मढ़ देने की.',  एक बुजुर्ग चूहे ने अपने जीवन का अनुभव बांटना चाहा।

एक तेजतर्रार चूहे से रहा नहीं गया. बोला- 'सिर्फ चूहा दौड़ में शामिल होने से काम नहीं बनता। ये नेता-अधिकारी दूसरे पर आरोप ही लगाएंगे या अपने ही शहर के लोगों को ट्रैफिक जाम से राहत दिलाने के लिए कोई ठोस कदम भी उठाएंगे? लोग परेशान हैं तो ब्रिज के रिपेयर में दोगुनी लेबर, मशीनरी क्यों नहीं लगा देते?'

'सही तो है. पहले निर्माण में कमीशन बंदरबांट, भ्रष्टाचार और अब रिपेयरिंग में हीलाहवाली। शहरियों की इतनी ही चिंता है इन्हें तो पुल चालू कराने के लिए दिन-रात एक क्यों नहीं कर देते?', चूहों की मंडली में से किसी ने हां में हां मिलाई।

'भाग-दौड़ में तो कमी नहीं दिख रही है, रात-दिन भी एक कर ही रहे हैं, लेकिन नेताओं, आला अफसरों को बहुत कुछ देखना है ना. कंपनी जिसने पुल बनाया, उस पर कोई आंच न आने पाए और ठेकेदार भी न फंसे? आखिरकार इन लोगों ने 'सरकारी सिस्टम के मुताबिक' ही तो काम किया था.', राजा के मंत्री सा दिखने वाले चूहे ने अपनी बात रखी तो कुछ क्षण के लिए पूरी सभा गंभीर हो गई.

तटस्थ भाव रखने वाले एक चूहे ने मौन तोड़ा। कहा, 'और नहीं तो क्या? डीसी साहब ने घटना होते ही जांच कमेटी बना दी. बस स्टैंड शिफ्ट करने का आदेश दे दिया। ट्रैफिक पुलिस वाले इस तपती-चलती-चुभती गर्मी में सड़कों पर जूझ रही है ताकि लोगों को कम से कम दिक्कत हो. नगर निगम का पूरा अमला अतिक्रमण हटाने में लगा है. अब कोई और कितना करेगा?'

'... लेकिन जांच रिपोर्ट अभी तक नहीं आ पाई? दानामंडी अस्थाई बस स्टैंड पर एक भी बस जा ही नहीं रही है? एंक्रोचमेंट की कोख से एक भी सड़क सही सलामत नहीं निकली। इन सबका क्या?', उम्र और कद में सबसे छोटे चूहे की इस हाजिर जवाबी से हर कोई दंग रह गया. 

सभा में कानाफूसी शुरू हो गई. एक अजीब सा तनावपूर्ण माहौल बनने लगा तभी सबसे बुजुर्ग चूहा खड़ा हुआ. बोला, ' तुम लोग दुनियादारी नहीं जानते, राजनीति नहीं समझते। नेताओं की मजबूरी नहीं देखते? उन्हें दोनों को साधना है. जाम से परेशान जनता और उन्हें भी, जिनकी कर्मठता से पुल का ये हाल हुआ.फिर अगले साल चुनाव भी आ रहे हैं. ऐसे में दोनों पक्ष जरूरी हैं. किसी को भी नाराज नहीं किया जा सकता है.'

'भले ही शहर की ऐसी की तैसी हो जाए. कोई तंत्र अपना काम करे न करे, हालात चाहे बेकाबू हो जाए, साफ हवा-पानी, इलाज सुलभ हो न हो, आम इंसान सुरक्षित महसूस करे न करे. बस नेतागीरी और अफसरी चमकती रहनी चाहिए?', किसी चूहे का सब्र कुछ इस तरह से टूटा।  

यह तीखा सवाल पूरी सभा से था, पर जवाब दिया वयोवृद्ध चूहे ने ही. 'साहबों-हाकिमों की पहली जवाबदेही तो जनता के प्रति ही है. उनकी सहूलियत हर हाल में पहली प्राथमिकता होनी ही चाहिए। लेकिन जन समस्याओं का इतना आसान और जल्दी समाधान हो जाए तो फिर सियासत कैसे फूले-फलेगी भइया? हमारी राजनीति और सरकारी व्यवस्था में आम आदमी अजर-अमर है. वह रोज जीता है, रोज मरता है. बस कभी मर ता नहीं। उसे कभी कुछ नहीं होता।

'... तो इस राजनीति में हमें क्यों घसीटा जा रहा, नाहक ही हमारी बिरादरी को बदनाम किया जा रहा है'., बहुत देर से धैर्य साधे बैठे नौजवान चूहे ने टोका।

संयम का परिचय देते हुए बूढ़ा चूहा फिर बोला, 'दूसरों को बदनाम करने में ही तो इन नेताओं का नाम होता है. ये सरोकारों, संस्कारों पर भाषण अच्छा देते हैं, किन्तु खुद कभी किसी बात की नैतिक जिम्मदारी नहीं लेते हैं. जनसेवा की इस नायाब परंपरा में अफसर अपना पूरा 'योगदान' देते हैं. किसकी हिम्मत जो भारतीय लोकतंत्र के इस 'पावन गठबंधन' के गले में 'घंटी' बांधे?'

तमाम तर्क-वितर्क, वाद-विवाद के बाद अब बारी थी राजा की. 'अंतहीन बहस है. बिरादरी की पिछली बैठक भी ऐसे ही घंटी बांधने के मुद्दे पर बिना नतीजा खत्म हुई थी. खैर, इस बार हमारी छवि को धक्का लगा है, इसलिए हमें लुधियानावासियों को हो रही परेशानी के लिए माफी मांगनी चाहिए. हम माफी मांगते भी हैं, भले ही पुल कमजोर करने में हमारी कोई भूमिका नहीं है', राजा ने लगभग फैसले सुनाने के अंदाज में कहा. 

अब तक इस गोपनीय बैठक की गुप्त खुफिया सूचना बड़े साहब के पास पहुंच चुकी थी. सरकारी तंत्र के सुरक्षाबल चौकस हुए. सभास्थल पर अचानक से बूटों और लाठियों की खटपट बढ़ने लगी. तभी सारे चूहे चिचियाते हुए तितर-बितर हो जाते हैं.

अब इसकी पृष्ठभूमि भी समझ लीजिए...

दरअसल, बात जून 2018 की है. मैं लुधियाना दैनिक भास्कर में संपादक था. शहर की लाइफलाइन गिल फ्लाईओवर को बंद हुए तकरीबन एक महीना से ऊपर हो गया था. पूरा शहर एक तरह से चोक था. पुल रिपेयर की तीन डेडलाइन निकल चुकी थी. लापरवाही और लालफीताशाही का आलम यह था कि पुल चालू करने को लेकर जिला प्रशासन अब कोई नई समयसीमा देने की हालत में नहीं था. शासन-प्रशासन के मुताबिक चूहों ने मिट्टी खोद डाली, इसलिए रिटेनिंग वाॅल ढह गई और पुल को आवाजाही के लिए बंद करना पड़ा. रिपेयर का काम है कि खत्म ही नहीं हो रहा था और शहर के लोग जाम से हलकान थे. तब अफसरों और सरकारी सिस्टम को जगाने के लिए खबर को इस तरह एक व्यंग्य के रूप में लिखा गया था.



गुरुवार, 5 मई 2022

सरदार! हमने आपका राशन खाया है… ...तो अब ये महंगाई तुझे खाएगी?

अरे! ओ सांभा! रामगढ़ की क्या रिपोर्ट है

बहुत शानदार सरदार। 

GST उगाही अब तक के अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई। जुलाई, 2017 में जब से आपने इसे लागू किया तब से पहली बार इस अप्रैल में 1.68 लाख करोड़ रुपए की टैक्स वसूली हुई। यही नहीं, तकरीबन 33.5% की ग्रोथ के साथ ग्रॉस टैक्स कलेक्शन(वित्तीय वर्ष अप्रैल 2021 से मार्च 2022 तक) 27.07 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया। यह हमारे बजट अनुमान से भी करीब 5 लाख करोड़ ज्यादा है सरदार।

इसमें डायरेक्ट टैक्स(इनकम+ काॅर्पोरेट टैक्स) की हिस्सेदारी 14.10 लाख करोड़ रुपए है। लगभग 49% की दर से इसका विकास हुआ। यह भी हमारे अनुमान से 3 लाख करोड़ ज्यादा है। अप्रत्यक्ष कर (एक्साइज) वसूली में 20 फीसद की ग्रोथ दर्ज की गई है। कुल मिलाकर रामगढ़ वाले हमारा खजाना तबीयत से भर रहे हैं सरदार।

बस, थोड़े त्रस्त हैं बेचारे। 

कह रहे थे- महंगाई ने बेहाल कर दिया है। पेट्रोल 122 रुपए/लीटर, सिलेंडर 1000 का, खाने-पीने के चीजों में आग लगी है। आलू, प्याज, टमाटर के बाद नींबू ने भी निचोड़ लिया। कमाने वाला एक, खाने वाले अनेक और ऊपर से चौतरफा महंगाई डायन बहुत नाइंसाफी है सरदार।

हूं। अच्छा रामगढ़ के चमचे, तू ये बता-

एक लीटर खाने का तेल, एक किलो नमक, एक किलो चना और घर के हर सदस्य के हिसाब से 5 किलो गेहूं/चावल जो मुफ्त में मिल रहा वो? क्या है वो? 

...और तो और तेरे छोटे सरदार ‘जोगिया’ ने दोबारा गद्दी संभालते ही फ्री अनाज की स्कीम को तीन महीने के लिए और बढ़ा दिया है। मुफ्त गैस कनेक्शन का घर-घर में 'उज्जाला' कर दिया, उसका कुछ नहीं?

अरे, ये रामगढ़ वाले न। मिडिल क्लास की मानसिकता से ऊपर नहीं उठ पाएंगे! 

यहां देश का नाम हो रहा। दुनिया में हमारा डंका बज रहा है। गंगा भले ही सूख रही हो, प्रदूषित हो रही हो, विकास की नदी अपने ऊफान पर है। भारत विश्व गुरू बनने वाला है और इन्हें, दो जून की रोटी की ही पड़ी रहेगी। देशविरोधियों से इनका बहुत याराना लगता है!

रामगढ़ वालो! इस महंगाई के ताप से तुम्हें िसर्फ एक ही चीज बचा सकती है और वो है खुद महंगाई।

जी, सरदार। और आपने तो कह ही दिया कि ये रतनगढ़, राजगढ़, देवगढ़, जूनागढ़, चुनारगढ़ और भवानीगढ़ वाले डीजल-पेट्रोल पर वैट नहीं घटा रहे, नहीं तो कीमतें इतनी गिर जाएं कि खुद ओपेक(देश) हमसे खरीदने लगे।


कितने आदमी थे?

आदमी नहीं, बुलडोजर थे सरदार।

बुलडोजर! हमारे रामगढ़ में बुलडोजर।

जी, सरकार। 

अब यहां से पच्चास पच्चास कोस दूर जब कोई बच्चा रोता है तो उसकी मां कहती हैसो जा नहीं तो बुलडोजर आ जाएगा!

और फिर भी तुम घोड़े पर बैठकर दुम दबाकर भाग आए।

क्या सोचा था? सरदार खुश होगा, इनाम में बुजडोजर देगा।

 हम्म। अब तेरा क्या होगा कालिया?

सरदार! हमने आपका राशन खाया है।

...तो अब ये महंगाई तुझे खाएगी। हाहा..।

अरे, ओ सांभा

होली कब है कब है होली?

सरदार! 

छोटी वाली इसी दिसंबर में गुजरात में और 2023 में राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और नार्थ ईस्ट में।

फिर 2024 में महाहोली। एकदम लट्‌ठमार वाली सरकार।

अरे, ये मोटा सरदार कहां मर गया?

सरदार, वो तो एक के एक बाद होली की तैयारियों में व्यस्त हैं, उसी की रणनीति को लेकर आज मीटिंग बुलाई है, इसलिए वह रतनगढ़ के दौर पर हैं।

हम्म

तभी गब्बर सिंह अपने हाथ पर चढ़ रही चींटी काे मसल दिया गांव से आंखों में हजारों सपने लिए शहर जा रहा एक और अहमद बेकारी, बेरोजगारी की भीड़ में कहीं खो गया। इसी के साथ एक और रहीम चाचा की जिंदगी में सन्नाटा छा जाता है

(डिस्क्लेमर- यह कथानक काल्पनिक घटनाओं पर आधारित है। इसका किसी मृत या जीवित व्यक्ति, भूत या प्रेतात्माओं, सूक्ष्मात्माओं से कोई वास्ता नहीं है। फिर भी यदि कोई शख्सियत, दल-संगठन, समाज, समुदाय, संस्था खुद को रत्तीभर भी जुड़ा हुआ या आहत महसूस करती है तो वो बस एक संयोग मात्र है।)

शुक्रवार, 25 मार्च 2022