नल्लामला की मनमोहक पहाड़ियां, हरे-भरे जंगल और कल-कल बहती कृष्णा। ऐसे बेजोड़ प्राकृतिक सुंदरता के बीच बसा है श्रीशैलम्। आंध्रप्रदेश के कर्नूल जिले का एक बेहद शांत और धार्मिक शहर. खुद की आबादी यहीं कहीं 25 हजार के आसपास है, बाकी इससे तो ज्यादा श्रद्धालु हर दिन यहां आते-जाते हैं. 12 ज्योतिर्लिंग में से दूसरे और शिव के स्वरूप मल्लिकार्जुन स्वामी यहीं विराजमान हैं.
श्रीशैलम् में आदि शिव के साथ देवी भ्रमरम्बा का भी अद्भुत वास हैं. भ्रमरम्बा को मां पार्वती का ही अंश माना जाता है और इनका मंदिर भारत के 18 महाशक्ति पीठों में से छठा है. देश में ऐसे ज्योतिर्लिंग बहुत अनूठे हैं, जहां भगवान शंकर और माता पार्वती दोनों के दर्शन होते हों. धार्मिक-ऐतिहासिक खासियतों और कुदरती खूबसूरती से लकदक ये नगर तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र वालों के लिए उनका बहुत प्रिय डेस्टिनेशन है. वीकेंड हो या कोई और छुट्टी, लोग पहुंच जाते हैं परिवार, नाते-रिश्तेदारों के साथ.
शानदार सड़कें, रेल-एयर की अच्छी कनेक्टिविटी और हरियाली से घिरे रास्ते यहां आने-जाने वालों का दिल खोलकर स्वागत करते हैं. वैसे तो लोगों का सालभर तांता लगा रहता है, लेकिन अक्टूबर से फरवरी तक अच्छा समय रहता है श्रीशैलम् घूमने का. धार्मिक पर्व या त्योहार और वीकेंड (शनिवार, रविवार, सोमवार) पर लोगों की खासी भीड़ रहती है.यहां की पवित्रता और प्रतिष्ठा यूं समझ सकते हैं कि श्रीशैल महाक्षेत्रम् को धरती पर दूसरा कैलाश माना जाता है.
आप बहुत सुकून पसंद हैं तो ऐसे दिनों को छोड़कर यात्रा प्लान कीजिए। जून से सितंबर तक का समय तो नेचर के साथ घुल-मिल जाने वालों के लिए अद्भुत ही है. हरियाली से लदे पहाड़, जंगल, नदी और डैम मानो बांध ही लेते हैं. प्रकृति से साथ जुड़ने का, कुछ पल उसके साथ जीने की अनुभूति चाहिए तो सड़क से और अपने साधन के आइए. बस इतना ध्यान रखिए कि ये रास्ता अमराबाद टाइगर रिजर्व के बीचो-बीच होगर गुजरता है, इसलिए गेट रात 9 बजे से लेकर सुबह 6 बजे तक बंद रहते हैं. इको सेंसटिव जोन होने के चलते इस दौरान व्हीकल्स की एंट्री पर रोक है.
कहते हैं प्रभु श्रीराम और पांडवों ने भी मंदिर परिसर में शिव लिंगम् की स्थापना की थी. 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य ने भी यहां रहकर तपस्या की, किताबें लिखीं। भारत को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने और अपनी प्राचीन सभ्यता-संस्कृति की रक्षा का प्रण उठाने वाले महान सम्राट शिवाजी भी मल्लिकार्जन स्वामी का आशीर्वाद लेने आए थे. भूमिका थोड़ी लंबी हो गई पर इस लेख का कोर यही हैं- शिवाजी महाराज.
शिवाजी महाराज, मार्च-अप्रैल के दरम्यान साल 1677 में यहां आए और तकरीबन 10 दिन तक तपस्या-साधना की. महान क्रांतिकारी, स्वाराज के संस्थापक, मुगलों-अंग्रेजों से लोहा लेने वाले, गुरिल्ला युद्ध के जनक, 17वीं शताब्दी में एक भारत, श्रेष्ठ भारत का सपना देखने वाले शिवाजी(1630-1680) की उसी श्रीशैलम् की यात्रा और उनके संपूर्ण जीवन वृतांत को यहां एक संग्रहालय की शक्ल में ढाला गया है. शिवाजी स्फूर्ति केंद्रम् की दीवारों पर शिवाजी का जीवन बहुत ही खूबसूरती से उकेरा गया है. विवरण हिंदी में लिखा गया है, लेकिन एक चीज जो खटकती है, वो है बड़े पैमाने पर भाषा की अशुद्धियां.
जब इतना अच्छा प्रयास किया गया तो किसी हिंदी पर पकड़ रखने वाले को पकड़ लेते, उससे लिखवा लेते. यहां घूमने आने वाले खासकर हम जैसे हिंदी भाषा-भाषी लोगों के लिए यह एक बुरा अनुभव है. अपने ही देश में ऐसे ही कई ऐतिहासिक जगहों, धरोहरों, मंदिरों, संग्रहालयों में भाषा की बुरी गत देखने को मिलती है. राष्ट्रपति मुर्म, संघ प्रमुख मोहन भागवत, पीएम मोदी जैसी बड़ी-बड़ी शख्सियतें इस म्यूजियम को दौरा कर चुकी हैं, पता किसी नजर क्यों नहीं पड़ी? शिवाजी का 19 फरवरी को जन्म दिवस है और वह चुनाव की दहलीज पर खड़े उत्तर प्रदेश की राजनीति के केंद्र में रहने वाले हैं. देश सबसे बड़े राज्य(आबादी) में 2027 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं.
महाराष्ट्र से दिल्ली का रास्ता कहीं न कहीं यूपी से तो होकर ही गुजरता है. केंद्र से लेकर इन प्रदेशों में भी एक ही पार्टी की सरकारें हैं. सियासी भावनाओं की एक जैसी बयार बह रही है. हवा के इसी रुख को समझा है महाराष्ट्र और यूपी के सरदारों ने. योगी सरकार ताजमहल के पास निर्माणाधीन संग्रहालय का नाम बदलकर छत्रपति शिवाजी महाराज म्यूजियम रखने जा रही है, जबकि फणनवीस सरकार भी आगरा में उसी जगह संग्रहालय बनवाने की तैयारी कर रही है, जहां शिवाजी को औरंगजेब ने 1666 में कैद कराया था. मेरी दोनों सरकारों से गुजारिश कि कृपया, इन जगहों पर भाषा और लिखावट का ध्यान रखिएगा.
(तस्वीरें ज्यादा मेरी खुद की खींची हुई हैं, एक-दो srisailadevasthanam.org और srisailamshivaji.org से ली गई हैं.)


















